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साहित्यिक और पुरातात्विक स्त्रोतो का वर्णन – archaeological & literary sources

स्त्रोत (sources) में साहित्यिक स्त्रोत और पुरातात्विक स्त्रोत (archaeological & literary sources) आते है. प्रागैतिहासिक काल का इतिहास लिखते समय इतिहासकार को पूर्णत:  पुरातात्विक साधनों पर निर्भर रहना पडता है. आध इतिहास लिखते समय वह साहित्यिक तथा पुरातात्विक दोनों प्रकार के साक्ष्यो का प्रयोग करता है और इतिहास लिखते समय वह इन दोनों साधनों के अतिरिक्त विदेशियों के वर्णनो  का भी प्रयोग करता है. इस लेख में हम archaeological & literary sources के साथ साथ विदेशियों के वृतांतों का भी वर्णन करेंगे.

प्रागैतिहासिक काल (prehistoric period) – जिसका कोई लिखित प्रमाण और साधन हमारे पास उपलब्ध नहीं है.

आध इतिहास – जिस काल का लिखित प्रमाण उपलब्ध है और उस काल में लेखन कला का तो प्रमाण है परन्तु या तो वे अपुष्ट है या तो फिर उनकी गूढ लिपि का अर्थ निकालना कठिन है.

इस आधार पर हड़प्पा संस्कृति से पूर्व का इतिहास प्रागितिहास और 600 ईसा पूर्व के बाद का इतिहास इतिहास कहलाता है

 

archaeological and literary sources in hindi (history notes) – साहित्यिक स्त्रोत और पुरातात्विक स्त्रोत (इतिहास नोट्स)

 

पुरातात्विक स्त्रोत (archaeological sources) – अभिलेख, सिक्के, स्मारक तथा भवन, मुर्तिया तथा चित्रकला आदि पुरातात्विक स्त्रोतो के अंतर्गत आते है.

अभिलेख

  • पुरातात्विक स्त्रोतो (archaeological sources) में सबसे महत्वपूर्ण
  • प्राचीन भारत के अधिकतर अभिलेख पत्थर या धातु की चादरों पर खुदे मिले है. अत: उनमे साहित्य की भांति हेर फेर करना संभव नहीं था.
  • सबसे प्राचीन अभिलेख बोगज कोई स्थान से प्राप्त हुआ है. यह स्थान मध्य एशिया में पड़ता है तथा इसका समय 1400 ईसा पूर्व माना जाता है. इस अभिलेख में हमें ऋग्वेद के समय इन्द्र, वरुण, मित्र के बारे में जानकारी प्राप्त होती है.
  • अशोक के अभिलेखों को सबसे प्राचीन माना जाता है. सबसे पहले इन अभिलेखों को 1837 ई० में जेम्स प्रिंसेप द्वारा पड़ा जा सका.
  • अशोक के बाद के अभिलेखों को हम दो वर्गो में बाँट सकते है – सरकारी अभिलेख और निजी अभिलेख!
  • सरकारी अभिलेख या तो राजकवियो की लिखी हुई प्रशस्तिया है या भूमि अनुदान पत्र! प्रशस्तियो का प्रसिद्ध उदाहरण समुन्द्रगुप्त का प्रयाग प्रशस्ति अभिलेख जो अशोक के स्तम्भ पर लिखा गया है. ये अभिलेख समुन्द्रगुप्त की विजयी तथा नीतियों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करता है.
  • राजा भोज की ग्वालियर प्रशस्ति , कलिंगराज खारवेल का हथिगुंफा अभिलेख, गौतमी बलश्री का नासिक अभिलेख, रूद्रदामा का गिरनार शिलालेख, स्कंदगुप्त का भीतरी स्तम्भ लेख और जूनागढ़ शिलालेख, बंगाल के शासक विजयसेन का देवपाड़ा अभिलेख औअर चालुक्य नरेश पुलकेशी द्वितीय का एहोल अभिलेख. ये सभी अभिलेख संबंधित नरेशो तथा राजाओ के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करते है.
  • व्यक्तिगत अभिलेखों में एक महत्वपूर्ण अभिलेख यमन राजदूत हिरोडोटस का बेसनगर स्थित गरुण स्तंभ लेख यह लेख भगवत धर्म के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करता है.
  • गुप्तकाल से पहले के ज्यादातर अभिलेखों की भाषा प्राकृत है. इनसे जैन, बौद्ध धर्म के विषय में जानकारी प्राप्त होती है. गुप्तकाल के बाद के अभिलेखों की भाषा संस्कृत है, जिनसे हमें ब्राह्मणों के विषय में जानकारी प्राप्त होती है
  • निजी अभिलेख बहुधा मंदिरों में या मूर्तियों पर उत्कीर्ण है. इन पर जो तिथियाँ खुदी है उनसे इन मंदिरों के निर्माण या मूर्ति – प्रतिष्ठापन का समय ज्ञात होता है. निजी अभिलेखों से तत्कालीन राजनितिक दशा का भी ज्ञान होता है क्योकि उनमे तत्कालीन शासको का भी बहुधा उल्लेख होता है.

स्मारक तथा भवन

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स्मारक और भवनों की सहायता से हमें प्राचीन भारत की सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक स्थिति का पता चलता है. प्राचीन काल के महलों और मंदिरों की शैली से वास्तुकला के विकास पर प्रयाप्त प्रकाश पड़ा है

अतरंजीखेड़ा में खुदाई से प्राप्त अवशेषों से लोहे के प्रारंभिक प्रयोग की जानकारी मिलती है

अरीकमेडू की खुदाई में सिक्के, बर्तन और दिप का एक टुकड़ा मिला है, जिससे पता चलता है की रोम के साथ हमारे मजबूत व्यापारिक संबंध थे.

भीतर गाँव के मंदिर, देवगड़ के मंदिर, अजंता की गुफाए आदि से हिन्दू सभ्यता व कला के बारे में जानकारी प्राप्त होती है

तंजौर का ब्रह्देश्वर मंदिर, कंपोडीया स्थित अंकोरवाट का मंदिर, जावा स्थित बोरोबुदूर स्मारक इस बात का प्रमाण है कि भारत के बाहर भारतीय धर्म और संस्कृती के प्रसार का उल्लेख प्राप्त होता है.

 

सिक्के (coins)

पुरातात्विक स्त्रोतों (archaeological sources) में सिक्को का स्थान भी अति महत्वपूर्ण है

प्राचीन सिक्को पर अनेक प्रकार के चिन्ह उत्कीर्ण है, उन पर किसी प्रकार के लेख नहीं है , भारत के प्राचीनतम सिक्को का प्रचलन लगभग 500 ईसा पूर्व के आस पास मन जाता है, इन सिक्को को आहत सिक्को के नाम से जाना जाता है. ये सिक्के चांदी से निर्मित थे  और व्यापारिक श्रेणियों के द्वारा जारी किये जाते थे.

जिस काल में अधिक सिक्के मिले है उस काल के बारे में अनुमान लगाया जाता है की वह काल व्यापार की दृष्टि से विकास का काल रहा होगा.

ये सिक्के प्राचीन भारत का राजनितिक इतिहास लिखने में बहुत उपयोगी सिद्ध हुए है.गुप्त शासको का इतिहास

अधिकतर उनके अभिलेखों के आधार पर लिखा गया है, किन्तु उनके सिक्को से भी उनकी उपलब्धियों पर प्रयाप्त प्रकाश पड़ा है.

सिक्को पर राजवंशो और देवताओं के चित्र, धार्मिक प्रतीक और लेख भी अंकित रहते है जिनसे तत्कालीन कला और धर्म पर प्रकाश पड़ता है.

यदि सिक्को पर कोई लिपि उत्कीर्ण हो तो उसका राज्यकाल पता चल जाता है.

 

मुर्तिया और चित्रकला

प्राचीन काल में कुषाणों, गुप्त शासको और गुप्तोत्तर काल में जो मुर्तिया बनाई गई उनसे जनसाधारण की धार्मिक आस्थाओ, उनके जीवन और मुर्तिकला के विकास पर बहुत प्रकाश पड़ा है

चित्रकला से हमें तत्कालीन जीवन की झलक देखने को मिलती है.

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